अतिथि शिक्षकों का तीन दिवसीय आंदोलन - Madhya Pradesh Teachers News

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

अतिथि शिक्षकों का तीन दिवसीय आंदोलन

 

मध्यप्रदेश के अतिथि शिक्षकों का तीन दिवसीय महा-आंदोलन



शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है और शिक्षक उस रीढ़ को मजबूत बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण अंग। लेकिन, जब शिक्षक खुद अपनी आजीविका और भविष्य को लेकर चिंतित हो, तो इसका असर पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ता है। मध्य प्रदेश में 'अतिथि शिक्षक' (Guest Teachers) पिछले कई वर्षों से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की अलख जगाए हुए हैं, लेकिन उनका अपना भविष्य अधर में लटका हुआ है। इसी संघर्ष को लेकर हाल ही में "आजाद स्कूल अतिथि शिक्षक संघ" ने एक बड़ा कदम उठाया है। 2 जनवरी से 4 जनवरी तक चलने वाला यह तीन दिवसीय आंदोलन न केवल टीकमगढ़ जिले में बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में अतिथि शिक्षकों की आवाज बनकर उभरा है। इस लेख में हम इस आंदोलन के कारणों, मांगों और इसके महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

आंदोलन का आगाज: खबर क्या है?

​जैसा कि समाचार पत्र की कटिंग (क्लिपिंग) में बताया गया है, "आजाद स्कूल अतिथि शिक्षक संघ" के तत्वावधान में मध्य प्रदेश के समस्त जिलों, विशेषकर टीकमगढ़ और पलेरा ब्लॉक में एक विशाल आंदोलन की शुरुआत की गई है। यह आंदोलन 2 जनवरी से शुरू होकर 4 जनवरी तक चलेगा। यह केवल एक साधारण धरना प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसमें आमरण अनशन, रैलियां और ज्ञापन सौंपने जैसे गंभीर कदम शामिल हैं।

​इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य सरकार का ध्यान अतिथि शिक्षकों की लंबित मांगों की ओर आकर्षित करना है। अतिथि शिक्षक लंबे समय से अपने अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। संघ ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया है कि सरकार उनकी सुध ले और ठोस निर्णय ले।

मुख्य मांग: हरियाणा मॉडल की तर्ज पर सुरक्षा

​इस आंदोलन की सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण मांग है— "हरियाणा अतिथि शिक्षक सेवा विधेयक 2019" को मध्य प्रदेश में लागू करना।

​अक्सर अतिथि शिक्षकों के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर यह हरियाणा मॉडल क्या है? दरअसल, हरियाणा सरकार ने अतिथि शिक्षकों के लिए एक विधेयक पास किया था, जिसके तहत उन्हें नौकरी की सुरक्षा प्रदान की गई। इसका मतलब यह है कि उन्हें बार-बार नौकरी से निकाला नहीं जाएगा और वे 58 वर्ष की आयु तक सेवा दे सकेंगे।

​मध्य प्रदेश के अतिथि शिक्षक संघ, और विशेष रूप से पलेरा ब्लॉक के अध्यक्ष रणजीत सिंह परमार, का कहना है कि मध्य प्रदेश में भी इसी तर्ज पर "संविदात्मक सेवा उपबंध" लागू किया जाना चाहिए। अतिथि शिक्षक चाहते हैं कि उन्हें नियमित शिक्षकों की तरह सम्मान और सुरक्षा मिले। वे नहीं चाहते कि हर साल सत्र खत्म होने पर उन्हें नौकरी जाने का डर सताए। यह मांग इसलिए भी जायज मानी जा रही है क्योंकि कई अतिथि शिक्षक पिछले 10 से 15 वर्षों से स्कूलों में पढ़ा रहे हैं और अब उनकी उम्र भी अन्य नौकरियों के लिए निकल चुकी है।

आंदोलन की रूपरेखा और कार्यक्रम

​समाचार के अनुसार, यह आंदोलन तीन दिनों तक चलेगा और इसमें विरोध के कई तरीके अपनाए जाएंगे:

  1. धरना प्रदर्शन: शिक्षक एक जगह इकट्ठा होकर शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
  2. आमरण अनशन: यह आंदोलन का सबसे गंभीर पहलू है। अपनी मांगों को मनवाने के लिए शिक्षक अन्न-जल त्यागकर सरकार पर नैतिक दबाव बनाएंगे।
  3. रैली और ज्ञापन: शिक्षक सड़कों पर उतरकर रैली निकालेंगे ताकि आम जनता को भी उनकी समस्याओं का पता चले। इसके बाद वे प्रशासन को मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के नाम ज्ञापन (Memorandum) सौंपेंगे।

​टीकमगढ़ जिले में मानदेय (Salary/Honorarium) से जुड़ी समस्याओं को भी प्रमुखता से उठाया जा रहा है। कई बार अतिथि शिक्षकों को समय पर वेतन नहीं मिलता है, जिससे उनके सामने परिवार को चलाने का संकट खड़ा हो जाता है।

स्थानीय नेतृत्व और एकजुटता की अपील

​किसी भी आंदोलन की सफलता उसके नेतृत्व और संगठन की मजबूती पर निर्भर करती है। इस आंदोलन में स्थानीय नेतृत्व की भूमिका अहम है। संघ के जिला अध्यक्ष पुनीत मोहन खरे और पलेरा ब्लॉक अध्यक्ष रणजीत सिंह परमार ने पूरी ताकत झोंक दी है।

​उन्होंने जिले के समस्त ब्लॉक अध्यक्षों, संकुल अध्यक्षों, कार्यकारिणी सदस्यों और आम अतिथि शिक्षकों (महिला और पुरुष दोनों) से अपील की है कि वे इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। उनकी अपील है कि प्रतिदिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और कार्यक्रम को सफल बनाएं। यह एकजुटता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर शिक्षक टुकड़ों में बंटे रहेंगे तो सरकार उनकी बात नहीं सुनेगी, लेकिन अगर वे एक साथ आवाज उठाएंगे, तो उस आवाज को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

अतिथि शिक्षकों की पीड़ा: एक विश्लेषण

​अतिथि शिक्षक शब्द सुनने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी है। ये वे शिक्षक हैं जो सुदूर ग्रामीण इलाकों में, जहां नियमित शिक्षक जाने से कतराते हैं, वहां जाकर बच्चों को पढ़ाते हैं।

  1. अल्प मानदेय: अतिथि शिक्षकों को जो मानदेय मिलता है, वह आज की महंगाई के दौर में बहुत कम है। कई बार तो यह मनरेगा मजदूर की दिहाड़ी से भी कम होता है। इतने कम पैसे में परिवार का भरण-पोषण करना, बच्चों की फीस भरना और घर चलाना एक बड़ी चुनौती है।
  2. नौकरी की अनिश्चितता: सबसे बड़ा डर नौकरी छूटने का होता है। जैसे ही कोई नियमित शिक्षक ट्रांसफर होकर आता है या नई भर्ती होती है, अतिथि शिक्षक को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। 10 साल सेवा देने के बाद भी वे वहीं खड़े रहते हैं जहां से उन्होंने शुरुआत की थी।
  3. भविष्य की चिंता: कई अतिथि शिक्षकों ने अपने जीवन के सुनहरे 10-15 साल इस उम्मीद में गुजार दिए कि सरकार कभी न कभी उन्हें नियमित करेगी। अब जब उनकी उम्र बढ़ गई है, तो वे किसी और सरकारी नौकरी के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते। ऐसे में "अनुभव और वरिष्ठता" के आधार पर हक मांगना उनकी मजबूरी नहीं, अधिकार है।

सरकार से उम्मीदें

​अतिथि शिक्षकों का यह आंदोलन सरकार के खिलाफ विद्रोह नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने की गुहार है। वे चाहते हैं कि सरकार अपने वादों को पूरा करे। पिछले कई चुनावों में राजनीतिक पार्टियों ने अतिथि शिक्षकों को नियमित करने के वादे किए, महापंचायतें बुलाई गईं, घोषणाएं हुईं, लेकिन जमीनी स्तर पर आदेशों का पालन उस तरह नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था।

​यह तीन दिवसीय आंदोलन सरकार को याद दिलाने का प्रयास है कि शिक्षक समाज का निर्माता है और अगर निर्माता ही भूखा और असुरक्षित रहेगा, तो निर्माण कैसे होगा? हरियाणा की तर्ज पर नीति बनाना एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है, जिससे सरकार पर एकदम से आर्थिक बोझ भी न पड़े और शिक्षकों को भी रोजगार की सुरक्षा मिल जाए।

निष्कर्ष

​2 जनवरी से शुरू हुआ यह आंदोलन केवल टीकमगढ़ या पलेरा का नहीं है, बल्कि यह मध्य प्रदेश के हजारों अतिथि शिक्षकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। आजाद स्कूल अतिथि शिक्षक संघ ने जो बीड़ा उठाया है, वह एक सराहनीय कदम है।

​अब देखना यह होगा कि शासन और प्रशासन इस तीन दिवसीय धरने, आमरण अनशन और रैलियों को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या सरकार "हरियाणा मॉडल" को लागू करने पर विचार करेगी? क्या अतिथि शिक्षकों के अनुभव का सम्मान किया जाएगा?

​अंत में, यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल स्कूल की इमारतें बनाने से नहीं होगा, बल्कि उन इमारतों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देने से होगा। हम उम्मीद करते हैं कि यह आंदोलन सफल हो और अतिथि शिक्षकों के घरों में भी खुशहाली आए। यह संघर्ष सम्मान का है, अधिकार का है और एक सुरक्षित भविष्य का है।

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